कल की शाम..हम और तुम और ये समा देखनेके लिये गये... असल मे ये मेरा दिवानापन था.. की संगीतमय वातावरण मे मनके अकेले पंछी को कहा..के जा रे उड जा रे पंछी ...जब मेरे दिल ने मन से पुछा की..जाता कहा है दिवाने... उसने कहा संगीत महफिल ऐसे बुला रही है..जैसे कोई अपने सनम से कहे.. आ जा सनम मधुर चांदनी में हम..
दिल ने आखिर मान लिया और अच्छा जी मैं हारी कहनेवाली दिल्लगी ही गा मेरे मन गा गाते गाते चल पडी....धीरे धीरे चलने वाले चांद को ..चांदनी भी पूछने लगी ..की जहा मैं जाती हुं वही चले आते हो और बार बार देखो ऐसा क्यू कहते हो...
तो मन ने कहा ये हवा..ये हवा सुरोंसे भरी हुई है.. उसे महसूस करो ... मन क्या गा रहा हैं,सुरोंसे कह रहा है... मुझको तुम जो मिले.. ये जहाँ मिल गया..
अब तक सुरोंकी जवानिया महफिल पे छा गयी थी.. और मन सोच रहा था की ये जिंदगी उसी की है जो सुरोंका हो गया... और शाम बता रही थी की उधर तुम हसी हो..और बेहतरीन गाने सुनते सुनते इधर माहोल जवान हो गया था...ऐसी इन हवाओमे, इन फिजाओमे..ये रात (भी सुरोंसे) भिगी भिगी होके... मेरे मन से कह रही.. मैं जिंदगी का साथ निभाते बितती रहुंगी ये मस्ती भरा है समा .. उसके साथ..
महफिल चलती रहेगी मोहब्बत जवान होने तक..
Sun sun sun sun की लालीमा दिल को सुन सुन सुन सुन जालिमा कहते कहते मन की चुनरी पर आनंद, अतृप्ती का एक अमीट दाग छोडकर निरंतर चलती रहेगी..
हम याने मन..तुम याने दिल..
हम याने गानेवाले और तुम याने रसिक ....और समा याने महफिल..
याद आया कुछ...?
कल की शाम..हम और तुम और ये समा ... सुनने के लिये गये थे ना... ना गुजरे हुवे जमाने मे...
लेखन :मुकुंद इंगळे