एक शाम रसिली...रफिली..!
वो एक हसीन शाम थी..मुझसा दिवाना जिसके ऊपर लाख निगाहें ठहरी थी..तेरे मेरे सपने मुझे कवी बना रहे थे...जब रुख से नकाब तूमने हटाया और मैने चौदाहवी का चांद दिल के झरोखेसे देखा.. तुम्हारे रंग और नुर की बारात जिंदगी का साथ निभाते निभाते... मन में चली आयी. ऐसा मौका फिर से मिले इसलीये तो मैने प्रेम पत्र लिखकर मेरे मन में नाचने वाले मोर से परदा हटाया था...
तबसे तुम्हे पुकारता चला आया...तेरी प्यारी सुरत को मेरे लिखे खत मे ढालते समय सर चकरा ना जाता तो ही तू इस तरहसे दर्द ए दिल से क्या हुवा तेरे वादोंको ये बार बार देखके..मेरे प्यार के सितारे बदन से लपेटकर.. आखिर तुम जो मिल गये ...तब मस्त बहारोंका आशिक बनके, तुम्हारा चांदसा रोशन चेहरा देखके ..अपने आपको कर चले हम फिदा..सिर्फ तुमपे...
इतनी हसीन वो एक शाम थी
लेखन:मुकुंद इंगळे
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